Sunday, November 15, 2009

फिर मारी बाजी



चुनाव की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले भाजपा से निलंबित राजेंद्र राठौड़ अपने गृहजिले चूरू की नगर परिषद चुनाव में फिर बाजी मारते दिखाई दे रह हैं। एक तो उन्होंने अपने चहेते रमाकांत ओझा को कमजोर दावेदारी और घटते जनाधार के बावजूद पार्टी का टिकट दिलवा दिया और दूसरे अब विजय श्री भी ओझा को ही मिलती दिख रही है। इसमें भी राठौड़ साहब की ही करामात दिखती है। भाजपा के तो खैर निलंबित ही सही, वे नेता है लेकिन ज्यादा बड़ी करामात तो उनके द्वारा कांग्रेस की टिकट दिलवाने को माना जा रहा है। चूरू के मौजूदा विधायक पुत्र और राजेंद्र राठौड़ के आपसी संबंधों की बात हमेशा से होती रही है, मौके-बेमौके इस बात को दोनों ने स्वीकारा भी है। कांग्रेस द्वारा गोविंद महनसरिया को टिकट दिए जाने से यह साबित हो गया है कि कांग्रस विधायक पुत्र पर भी राठौड़ साहब की पकड़ उतनी ही बरकरार है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस ने हारने के लिए अपने प्रत्याशी को खड़ा कर दिया है और चुनाव जीता देने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ता टिकट की कतार में खड़े देखते ही रह गए। दूसरे उम्मीदवार भी मैदान में इस तरह के हैं, जिन्हें देखकर कहा जा सकता है कि अब रमाकांत ओझा की जीत में कोई शक नहीं। आगे, खुदा जाने...

लोकतंत्र बड़ा कि स्वाइन फ्लू


लोकतंत्र का महाउत्सव है चुनाव। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव की धूम चरम पर है। शहरों में कार्यालय खुल रहे हैं, प्रचार प्रसार के लिए नेताओं की सभाएं हो रही हैं। एक तरफ तो स्वाइन फ्लू पर नियंत्रण के लिए स्कूलों में सामूहिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी गई है दूसरी ओर इन नेताओं की सभाओं पर किसी प्रकार का नियंत्रण घोषित नहीं किया गया है तो फिर कैसे होगा स्वाइन फ्लू पर नियंत्रण। पर इन नेताओं पर शिकंजा कौन कसे? जिस दिन इन पर शिकंजा कसने वाला माई का लाल कोई पैदा हो गया, उस दिन स्वाइन फ्लू तो क्या, भष्टाचार और आतंकवाद जैसी तमाम बीमारियां मिट ही जाएंगी। बहरहाल, स्वाइन फ्लू जोरों पर है और चुनाव प्रचार भी। देखते जाइए, अंतिम परिणाम देखकर ही पता चलेगा कि कौनसी चीज कितनी नुकसानदेह साबित हुई। इतना जरूर तय है कि जनता को तो बीमार ही होना है। जनता बेचारी द्रौपदी जो ठहरी... इस कलयुग में कोई कृष्ण भी नहीं दिखता।

स्वाइन फ्लू बनाम जवाहर लाल नेहरू


पूरे राजस्थान भर में स्वाइन फ्लू का चर्चा जोरों पर है। स्वाइन फ्लू के चलते पूरे प्रदेश के विद्यालयों में प्रार्थना सभाओं और बाल सभाओं पर रोक लगा दी गई है। स्वाइन फ्लू की वास्तविक स्थिति क्या है ? यह वास्तव में एक खतरनाक संक्रामक महामारी के रूप में पैर पसार रही है या नहीं, इसे लेकर ज्यादा सोचने की जहमत उठाइये। मान लीजिए कि सरकार और प्रशासन ने तय कर लिया है कि बीमारी है, तो फिर बीमारी है। सवाल इससे निपटने का है अब। इसी सिलसिले में स्कूलों में सभी सामूहिक कार्यक्रमों पर रोक लगी है। लेकिन शनिवार को नेहरू जयंती धूमधाम से मनाए जाने के समाचारों से अटे पड़े हैं स्थानीय समाचार पृष्ठ। अब किसे सही माने? प्रशासन के इस दावे को कि सभी सामूहिक कार्यक्रम बंद है या फिर इन समाचारों को जिनमें भारत के महान प्रथम प्रधानमंत्री को मिल-जुल कर सामूहिक आयोजन के साथ याद किया जा रहा है। अखबारों की खबरों में विश्वसनीयता की स्थिति को देखकर जरूर संतोष किया जा सकता है। इस दर्शन के मुताबिक न तो स्वाइन फ्लू इतने खतरनाक ढंग से फैला हुआ है, जितना कि अखबारों में बताया जा रहा है और न ही नेहरू को इस शिद्दत से किसी ने याद किया होगा। इसमें भी विज्ञप्तिजीवियों की ही करामात ही ज्यादा दिखाई देती है। फिर भी सोचने को सवाल तो है ही।