पूरे राजस्थान भर में स्वाइन फ्लू का चर्चा जोरों पर है। स्वाइन फ्लू के चलते पूरे प्रदेश के विद्यालयों में प्रार्थना सभाओं और बाल सभाओं पर रोक लगा दी गई है। स्वाइन फ्लू की वास्तविक स्थिति क्या है ? यह वास्तव में एक खतरनाक संक्रामक महामारी के रूप में पैर पसार रही है या नहीं, इसे लेकर ज्यादा सोचने की जहमत उठाइये। मान लीजिए कि सरकार और प्रशासन ने तय कर लिया है कि बीमारी है, तो फिर बीमारी है। सवाल इससे निपटने का है अब। इसी सिलसिले में स्कूलों में सभी सामूहिक कार्यक्रमों पर रोक लगी है। लेकिन शनिवार को नेहरू जयंती धूमधाम से मनाए जाने के समाचारों से अटे पड़े हैं स्थानीय समाचार पृष्ठ। अब किसे सही माने? प्रशासन के इस दावे को कि सभी सामूहिक कार्यक्रम बंद है या फिर इन समाचारों को जिनमें भारत के महान प्रथम प्रधानमंत्री को मिल-जुल कर सामूहिक आयोजन के साथ याद किया जा रहा है। अखबारों की खबरों में विश्वसनीयता की स्थिति को देखकर जरूर संतोष किया जा सकता है। इस दर्शन के मुताबिक न तो स्वाइन फ्लू इतने खतरनाक ढंग से फैला हुआ है, जितना कि अखबारों में बताया जा रहा है और न ही नेहरू को इस शिद्दत से किसी ने याद किया होगा। इसमें भी विज्ञप्तिजीवियों की ही करामात ही ज्यादा दिखाई देती है। फिर भी सोचने को सवाल तो है ही।
Sunday, November 15, 2009
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