लोकतंत्र का महाउत्सव है चुनाव। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव की धूम चरम पर है। शहरों में कार्यालय खुल रहे हैं, प्रचार प्रसार के लिए नेताओं की सभाएं हो रही हैं। एक तरफ तो स्वाइन फ्लू पर नियंत्रण के लिए स्कूलों में सामूहिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी गई है दूसरी ओर इन नेताओं की सभाओं पर किसी प्रकार का नियंत्रण घोषित नहीं किया गया है तो फिर कैसे होगा स्वाइन फ्लू पर नियंत्रण। पर इन नेताओं पर शिकंजा कौन कसे? जिस दिन इन पर शिकंजा कसने वाला माई का लाल कोई पैदा हो गया, उस दिन स्वाइन फ्लू तो क्या, भष्टाचार और आतंकवाद जैसी तमाम बीमारियां मिट ही जाएंगी। बहरहाल, स्वाइन फ्लू जोरों पर है और चुनाव प्रचार भी। देखते जाइए, अंतिम परिणाम देखकर ही पता चलेगा कि कौनसी चीज कितनी नुकसानदेह साबित हुई। इतना जरूर तय है कि जनता को तो बीमार ही होना है। जनता बेचारी द्रौपदी जो ठहरी... इस कलयुग में कोई कृष्ण भी नहीं दिखता।
Sunday, November 15, 2009
लोकतंत्र बड़ा कि स्वाइन फ्लू
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